छत्तीसगढ़ के जशपुर की चाय और सरगुजा की लीची के बाद लोग अब छत्तीसगढ़िया अदरक और हल्दी का भी स्वाद ले सकेंगे। यह राज्य सरकार की कृषि क्षेत्र में बड़े प्रयोग की कवायद का हिस्सा है। राज्य के विभिन्न जिलों की मिट्टी और जलवायु के हिसाब से वहां उद्यानिकी फसलों की खेती की योजना तैयार की गई है।
योजना के पहले चरण में राज्य के 14 जिलों को नौ प्रकार की उद्यानिकी फसलों के लिए चयनित किया गया है। इसमें बालोद जिला अदरक और सूरजपुर जिला हल्दी के लिए उपयुक्त पाया गया है। इसी तरह रायपुर व बेमेतरा में पपीता, दंतेवाड़ा में आम, मरवाही व कांकेर में सीताफल, जशपुर में चाय, कोंडागांव में काजू, कोरिया, मुंगेली, रायगढ़ व दुर्ग जिले में टमाटर और सरगुजा जिले में लीची की खेती को प्रोत्साहन दिया जाएगा।
लीची के फल अपने आकर्षक रंग, स्वाद और गुणवत्ता के कारण भारत में भी नही बल्कि विश्व मेंअपना विशिष्ट स्थान बनाए हुए है। लीची उत्पादन में भारत का विश्व में चीन के बाद दूसरा स्थान है। पिछले कई वर्षो में इसके निर्यात की अपार संभावनाएं विकसित हुई हैं, परन्तु अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बड़े एवं समान आकार तथा गुणवत्ता वाले फलों की ही अधिक मांग है। अत: अच्छी गुणवत्ता वाले फलों के उत्पादन की तरफ विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इसकी खेती के लिए एक विशिष्ट जलवायु की आवश्यकता होती है, जो सभी स्थानों पर उपलब्ध नहीं है।
छत्तीसगढ़ में एक गाँव ऐसा भी है जो फलदार वृक्षों वाला गाँव के रूप में जाना जाएगा। जो जाना जाएगा पहाड़ों पर लीची के स्वाद के लिए । चलिए ज्यादा पहेलियाँ नहीं बुझाते और आप को लिए चलते हैं प्रदेश के सबसे सुंदर अंचल सरगुजा में । सरगुजा जिसके गोद में प्रकृति का अथाह खज़ाना है। जहां हरे-भरे सुंदर वन और पहाड़ है, जहाँ कोयला का भंडार है। इसी पहाड़ पर अब लीची के वृक्ष लहलहाने वाले हैं ।
सरगुजा में काम कर रही शैक्षेणिक संस्था ‘शिक्षा कुटीर’ ने मैनपाट अंचल के आदिवासी समाज से जुड़े लोगों के लिए आय में एक अतरिक्त साधन जोड़ने की ज़रूरत महसूस की । जिससे उनके स्थानीय ज्ञान और पर्यावरण के अनुकूल हो। इसके लिए संस्था ने पहाड़ के तराई पर बसे रकेली गाँव का चयन किया । रकेली गाँव में लीची के पौधों का रोपण किया है। संस्था ने पौधों को जीवित और सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी से ग्रमीणों को जोड़ा है। संस्था ने रकेली गाँव के साठ घरों में लीची के पेड़ अपने खर्च से लगवाए । सबसे पहले संस्था ने इसके लिए रकेली गाँव का चयन किया। चूंकि सरगुजा और जशपुर की आबोहवा लीची के लिए उपयुक्त है लिहाज़ा संस्था ने गाँव के कुछ लोगों से चर्चा करके तय किया कि गाँव वालों को घरों में लीची लगवाई जाएं। संस्था ने इसके लिए पैसे इकट्ठे किए और जुलाई के पहले हफ्ते में कृषि महाविद्यालय से उन्नत किस्म के लीची के पौधे खरीदे।
जिन 60 घरों में पौधे लगाए गए उनके साथ एक शर्त भी जोड़ी। शर्त यह कि अगर लापरवाही से लीची के पेड़ नष्ट होते हैं, तो लीची के पौधे की कीमत उस व्यक्ति को अदा करनी पड़ेगी। गांव वालों ने इस शर्त को स्वीकार किया और साठ घरो में लीची के पेड़ लगा दिए गए। शिक्षा कुटीर ने अपनी जिम्मेदारी सिर्फ पेड़ बांटने तक नहीं रखी बल्कि इसकी देखरेख अच्छे से हो एवं पौधों का सर्ववाइवल रेट बेहतर हो , इसके इंतज़ाम के लिए संस्था ने पौधे बांटने और लगवाते समय दो कृषि वैज्ञानिकों डॉ एस आर दुबोलिया और डॉक्टर जी पी पैकरा की सेवाएं ली। उनके मार्गदर्शन में पौधे लगवाये। वैज्ञानिकों ने गाँव वालों को समझाया कि कैसे पौधे की देखभाल करनी है । और अगर कोई बीमारी पौधे को लग जाए तो कैसे बचाव करना है । संस्था ने अभी ये प्रायोगिक तौर पर किया है और शुरुआती परिणाम अभी ठीक हैं । अगर ये प्रयोग सफल रहा तो संस्था इसे अगले साल वृहद स्तर लीची के पौधों को रोपण करेगी।