Sanjay Kumar Singh
29-11-2022 02:45 AMडॉ. एस.के .सिंह
प्रोफेसर सह मुख्य वैज्ञानिक ( पौधा रोग), प्रधान अन्वेषक अखिल भारतीय अनुसंधान परियोजना फल
एवम् सह निदेशक अनुसंधान
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय
पूसा , समस्तीपुर बिहार
जलवायु परिवर्तन एवं विविध कारणों की वजह से भारतवर्ष में सर्वप्रथम बौनी प्रजाति के केला में पनामा विल्ट रोग वर्ष 2015 में बिहार के कटिहार जिले में पाया गया। पनामा विल्ट केला की एक प्रमुख बीमारी है, जो केला की उपज को प्रभावित करता है । इस रोग की वजह से बिहार के कोशी क्षेत्र के किसान केला की खेती छोड़ कर अन्य फसलों की तरफ जा रहे है। इस बिमारी की तुलना कोविड़-19 से भी कर सकते है, क्योंकि आज तक इस बिमारी का कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं खोजा जा सका है।
बिहार में केला कुल 34.64 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में उगाया जाता है, जिससे कुल 1526 हजार टन उत्पादन प्राप्त होता है। बिहार की उत्पादकता 44.06 टन /हेक्टेयर है। राष्ट्रीय स्तर पर केला 880 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में उगाया जाता है, जिससे कुल 30,008 हजार टन उत्पादन प्राप्त होता है। केला की राष्ट्रीय उत्पादकता 34.10 टन /हेक्टेयर है।
फ्यूजारियम विल्ट (मुरझान) रोग का क्या महत्व है?
फ्यूजारियम मुरझान रोग या पनामा रोग मृदाजनित कवक रोग फ्यूजेरियम, आक्सीस्पोरम फा. स्पि. क्यूवेन्स है और भारत सहित पूरे विश्व में अत्यंत विध्वंसकारी है।
भारत के लगभग सभी वाणिज्यिक किस्मों को प्रभावित कर सकता है। यदि एक बार खेत रोगग्रस्त हो जाता है तो इसके रोगाणु मृदा में 35-40 वर्षो से अधिक समय तक जीवित रह सकते है और सम्पूर्ण पौधों के मृत्यु का कारण बन सकते हैं।
केला उत्पादन के लिए फ्यूजारियम विल्ट रोग एक गंभीर समस्या बन रही है और तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश, केरल, बिहार ओडिसा, पश्चिम बंगाल तथा उत्तर पूर्वी राज्यों में यह रोग बड़े पैमाने पर व्याप्त है।
इस रोग के कारण बिहार की प्रमुख स्थानीय प्रजाति मालभोग लुप्तप्राय होने की कगार पर है ।
भारी नुकसान के कारण प्रदेश के अनेक भागों के किसानों ने अन्य प्रकार की फसलों जैसे हल्दी, मक्का, गन्ना इत्यादि उगाने लग गए हैं।
रोगकारक (फ्यूजेरियम, आक्सीस्पोरम फा. स्पि. क्यूवेन्स)
फ्यूजेरियम आक्सीस्पोरम फा.स्पि. क्यूवेन्स की चार प्रभेद पायी जाती है। जो किसी प्रजाति विशेष को ही प्रभावित करती है शिवाय रेस -4 के ,जैसे
ट्रापिकल रेस 4 क्या है ?
फ्यूजारियम रेस 4 कवकीय फ्यूजेरियम, आक्सीस्पोरम फा. स्पि. क्यूवेन्स की ही एक नस्ल है जो केलों के कैवेनडिश समूह के केलों सहित सभी केलों को संक्रमित करती है। यह विशेष नस्ल जो वीसीजी 01213/16 नामक एक विशेष वानस्पतिक संगतता समूह (वेजीटेटिव कम्पाटेबिल्टी ग्रुप) से संबंधित है, भारत के उष्णकटिबंधीय तथा उपोष्ण कटिबंधीय दोनों ही क्षेत्रों में उगाए जाने वाले केलों के सभी किस्मों को संक्रमित कर सकती है।
फ्यूजारियम की यह नस्ल कैवेनडिश समूह के केलों को भी संक्रमित कर सकती है, अतः भारतीय केला उद्योग को भारी नुकसान होने की संभावना है क्योंकि यह उद्योग मुख्यतः कैवेडिश क्लोनों (बसराय, रोबस्टा, हरिछाल, ग्रैंड नैने) पर निर्भर है जिन्हें केलों की खेती की कुल भूमि के 52% भूमि पर उगाया जाता है और कुल केला उत्पादन में इनका योगदान 64% है।
फ्यूजेरियम, आक्सीस्पोरम फा. स्पि. क्यूवेन्स टीआर-4 : ग्लोबल परिदृश्य
ताइवान, मलेशिया, इंडोनेशिया (जावा, सुमत्रा, सुलावेसी, हलमहेरा, बोरनियो द्वीप में कालीमंथन तथा न्यू गुयाना द्वीप के पपुआ क्षेत्र), मेनलैंड चाइना (गौंगडोंग, हयनन, गौंगक्सी, फ्यूजियन तथा यूनन्न), मिनडानव के फिलीपाइन द्वीप, आस्ट्रेलिया (उत्तरी क्षेत्र), ओमन, जार्डन तथा मोजम्बिक, लेबनान तथा पाकिस्तान, लाओस तथा वियतनाम के अलावा आस्ट्रेलिया के क्वीन्सलैंड से इस खतरनाक नस्ल ट्रापिकल रेस 4 की सूचना मिली है और इससे गंभीर क्षति होती है।
फ्यूजेरियम, आक्सीस्पोरम फा. स्पि. क्यूवेन्स टीआर-4 : राष्ट्रीय परिदृश्य
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा, समस्तीपुर एवं आईसीएआर-एनआरसीबी द्वारा अब तक किए गए सर्वेक्षण से सूचना मिली है कि बिहार राज्य के कटिहार एवं पूर्णिया जिलों, उत्तर प्रदेश के फैजाबाद एवं बाराबंकी जिलों, गुजराज के सूरत जिले तथा मध्य प्रदेश के बुरहनपुर जिले में खतरनाक नस्ल ट्रापिकल रेस 4 की मौजूदगी है।
रोग के लक्षण: बाहरी लक्षण
रोग के लक्षण: आतंरिक लक्षण
प्रकंद (कार्म) पर पीला, लाल या भूरी लडियां मौजूद होती है और आभासी तने में काले या भूरे या पीले रंग की लड़ियां होती है और कभी-कभी कवकों के कारण नाडियों के ऊतकें रंगविहीन होने से गुच्छे के डंठल पर भी लडियां आ जाती है।
पौधों में इस रोगाणु के प्रवेश और जीवित रहने की पद्धति
मृदा में मौजूद रोगाणु केले के पौधे को जड़ों के माध्यम से संक्रमित करते हैं, इसके बाद प्रकंद के माध्यम से आभासी तने में मौजूद नाड़ी तंत्र को और अंततः तने में जल और पोषक तत्वों के आवागमन को अवरूद्ध कर देते हैं । इससे पत्तिया पीली पड़ जाती है और पौधे की मृत्यु हो जाती है।
फ्यूजारियम रोगाणु दसको तक क्लेमीडोस्पोर्स के रूप में जीवित रह सकते हैं। एक बार खेत में प्रवेश कर जाने पर क्लेमीडोस्पोर्स के रूप में 40 वर्षो से अधिक समय तक जीवित रह सकते हैं।
ये रोगाणु खरपतवारो पर जीवित रह सकते है जैसे, क्लोरिस इनफ्लाटा, क्लोरिस बरबाटा (परपल टाप क्लोरिस), कोम्मोलिना डिफ्यूजा, एनसेटे वेट्रीकोसम, यूफोरबिया हेटेरोफाइला, ट्राइडेक्स प्रोकम्बेंस तथा पैनीकम परप्यूरेसेंस को भी संक्रमित करते और उनमें जीवित रहते हैं।
रोग का प्रसार
फ्यूजारियम रोगाणु संक्रमित सकर की आवा-जाही एवं रोपण से य पौधों के संदूशित भाग जैसे आभासी तना के ऊतक तथा संक्रमित पौधों की पत्तियों के लाने या ले जाने से य कृषि उपकरणों, कैंटेयनर, औझार, पशु , जूते, कपड़ों में लगी मिट्टी तथा सक्रमित मृदा का अधःस्तर के रूप में उपयोग से य तेज आंधीय तेज हवाओं य भारी वर्षा एवं बाढ़ य सिंचाई जल य वर्षा के बाद जल की निकासी से य रोगमुक्त क्षेत्र तथा रोगग्रस्त के बीच नदीय प्रवाह य खेत में पौधों के जड़ो से अन्य जड़ों से सम्पर्क य कीट वेक्टरों विषेशकर केलों के घुन जैसे,प्रकंद बेधक (कार्म बोरर) कास्मोपोलाइट्स सार्डीडस तथा तना बेधक (स्टेम बोरर) भी रोगाणु फैलाव में सम्मिलित हैं।
रोग का प्रबंधन
इस रोग का कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं खोजा जा सका है, इसे केवल प्रबंधित करके कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है,यथा
अगली फसल से पूर्व
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