Sanjay Kumar Singh
29-04-2023 04:38 AMप्रोफेसर (डॉ) एसके सिंह
प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना एवं
सह निदेशक अनुसन्धान
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार
सुबबूल, यह बहुवर्षीय किस्म का होता है। सुबबूल एक पेड़ है, जो कम पानी एवं कम देखरेख पर भी बहुत तेजी से बढ़ता है। यह सालभर हर-भरा रहता है। सुबबूल, लेग्युमिनोसी कुल से संबंध रखता है। इसका वैज्ञानिक नाम ल्यूसीना ल्यूकोसेफला और साधारण नाम सुबबूल, बहुवर्षीय ढैचा इत्यादि कई नामों से जाना जाता है। सुबबूल की खेती मुख्यतः आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगड उड़ीसा, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार में भी सफलतापूर्वक किया जा रहा है। इससे कई फायदे है यथा जानवरों को चारा मिलता है क्योकि यह साल भर हराभरा रहता है, गर्मियों में जब हरे चारे की कमी हो जाती है तब भी इससे हरा चारा प्राप्त कर सकते है। बॉर्डर बनाने के क्रम में कटाई छटाई के उपरांत जो लकड़ी प्राप्त होता है उसे जलावन में प्रयोग कर सकते है।
लेग्युमिनोसी कुल का होने की वजह से मिट्टी में नत्रजन उपलब्ध करता है, जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होता है। इसे केला -पपीता के खेत के किनारे बतौर बॉर्डर लगाया जाना चाहिए। इसे लगाने से कई फायदे है यथा, छोटे जानवरों से बचाव करता है तथा तेज हवा से केला –पपीता जैसे कमजोर फसलों को बचाता है। समय-समय पर इसकी कटाई -छटाई करके बहुत अच्छा खेत के किनारे घना बॉर्डर बनाया जा सकता है। इससे बने घने बॉर्डर से बहुत से छोटे जानवरों के साथ साथ बड़े जानवरों से भी बचाव होता है। इससे बहुत ही सस्ता अस्थाई बॉर्डर तैयार हो जाता है, जो हर भरा होने की वजह से बहुत ही अच्छा लगता है एवं आसपास के वातावरण को भी संतुलित करने में सहयोग देता है । इसकी कटाई -छटाई निश्चित अन्तराल पर करते रहना अनिवार्य है, अन्यथा यत्र -तत्र फैले हुए अच्छे नही लगेंगे। इसे लगाने के लिए, यदि खेत में इस समय पर्याप्त नमी हो हो खेत के चारो तरफ 6 से 8 इंच चौडाई में अभी बुवाई करे । केला एवं पपीता जैसे फसलों को लगाने से कम से कम 1 महीना पहले इसकी बुवाई कर लेना चाहिए। यदि आप पपीता की खेती करने जा रहे है तो यह और भी आवश्यक हो जाता है। क्योकि इसको लगाने से पपीता की सबसे खतरनाक विषाणुजनित बीमारी पपाया रिंग स्पॉट की उग्रता में भी भारी कमी आती है। इसकी वजह से इस बीमारी को फैलाने वाला फंख वाला एफिड जो लगभग 4-5 फीट की उचाई तक उङता है, उसके उड़ने में मुश्किल आता है, इस प्रकार से एफिड इस रोग को नही फैला पाता है। पपाया रिंग स्पॉट रोग के प्रबंधन की तकनीक का यह प्रमुख हिस्सा है।
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