One District One Product- Lakhimpur Khiri

Lakhimpur Khiri



लखीमपुर खीरी ज़िला भारत के उत्तर प्रदेश राज्य का एक ज़िला है। ज़िले का मुख्यालय लखीमपुर है। ज़िला नेपाल की सीमा से सटा हुआ है और इसका नाम लखीमपुर और खीरी के दो नगरों पर रखा गया है।

भारत, नेपाल सीमा पर स्थित लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है। इसकी प्रशासनिक राजधानी लखीमपुर शहर है।

गेहूं, चावल, मक्का, जौ और दालें प्रमुख खाद्य फसलें हैं। हाल ही में किसानों ने जिले में मेन्थॉल टकसाल खेती शुरू कर दी है, क्योंकि तराई क्षेत्र यह टकसाल खेती के लिए आदर्श है। चीनी गएई और तिलहन प्रमुख गैर-खाद्य फसलें हैं। स्थानीय जिले की रीढ़ की हड्डी बनकर इस जिले में चीनी का उत्पादन और संसाधित किया जाता है।

केला दुनिया के सबसे लोकप्रिय फलों में से एक है। यह उत्पादन के मामले में गेहूं, चावल और मक्का के बाद चौथी सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसल है। खपत के हिसाब से देखें तो यह दुनिया के पसंदीदा फलों में शामिल है। इसे न केवल कच्चा खाया जाता है, बल्कि जूस, सॉस, पके हुए माल और विभिन्न व्यंजन बनाने में भी उपयोग किया जाता है। भारत वैश्विक केले के उत्पादन का 30% उत्पादन करता है।

उत्तर प्रदेश में कुल 3078.73 हजार मीट्रिक टन का उत्पादन होता है । उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों जैसे में लखीमपुर, महाराजगंज, कुशीनगर, इलाहाबाद, कौशाम्बी आदि में अंतरराष्ट्रीय बाजार के निर्यात योग्य केले उगाने की अत्यधिक क्षमता है।

जिले में धौरहरा, निघासन व मितौली क्षेत्र में किसानों ने परंपरागत खेती के साथ ही अब केले की खेती को प्राथमिकता देनी शुरू कर दी है। टिश्यू कल्चर विधि ने केले का उत्पादन बढ़ाया है। टिश्यू कल्चर से खेती करने वाले किसान मालामाल हो रहे हैं। खीरी जिले में पिछले दो तीन वर्षों से केले की खेती के प्रति लोगों का आर्कषण बढ़ा रहा है। बायोटेक्टनोलॉजी से लैब में टिश्यू कल्चर पौधे तैयार किए जाते हैं।

लखीमपुर खीरी का यह कुटीर उद्योग बहुत से लोगों को रोजगार प्रदान करने में सक्षम है। केले से निर्मित चिप्स, केले के तने से बने उत्पाद, चटाइयाँ, बैग इत्यादि पारम्परिक शैली में होते हुए भी आधुनिकता के साथ जुड़े होते हैं। यहाँ बने उत्पादों को समाज के हर वर्ग द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। कलाकृतियाँ, दैनिक प्रयोग में आने वाली वस्तुएँ तथा केले के अनुपयोगी भाग को जैविक खाद हेतु भी प्रयोग किया जाता है। बायो –डीग्रेडेबल होने के कारण केला या उसके अवशेष पर्यावरण को कोई हानि भी नहीं पहुंचाते।

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