Sanjay Kumar Singh
12-01-2023 03:37 AMडॉ एसके सिंह
प्रोफेसर (पादप रोग)
प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसन्धान परियोजना
एवं सह निदेशक अनुसन्धान
डा. राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार
सिगार ईण्ड रॉट दो वर्ष पूर्व केला का एक कम महत्वपूर्ण रोग माना जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं। अब हां एक महत्वपूर्ण रोग के तौर पर उभर रहा है जिसका मुख्य कारण वातावरण में अत्यधिक नमी का होना प्रमुख कारण है।
यह रोग फलों के सिरे पर सूखे, भूरे से काले सड़े से दिखाई देता है। कवक की वृद्धि वास्तव में फूल आने की अवस्था से ही शुरू हो जाती है और फलों के परिपक्व होने के समय में या उससे पहले भी दिखाई देते है। प्रभावित क्षेत्र भूरे रंग के कवक विकास से ढके होते हैं जो सिगार के जले हुए सिरे पर राख की तरह दिखते हैं, जिससे सामान्य नाम होता है। भंडारण में या परिवहन के दौरान यह रोग पूरे फल को प्रभावित कर सकता है, जिसके परिणामस्वरूप "ममीकरण" प्रक्रिया हो सकती है। फलों का आकार असामान्य होता है, उनकी सतह पर फफूंदी दिखाई देती है और त्वचा पर घाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
सिगार इंड रॉट केले के फलों का एक प्रमुख रोग है। यह मुख्य रूप से कवक ट्रेकिस्फेरा फ्रुक्टीजेना द्वारा और कभी-कभी एक और कवक वर्टिसिलियम थियोब्रोमे द्वारा भी होता है। इस रोग का फैलाव हवा या बारिश के माध्यम से होता है स्वस्थ ऊतकों को पर कवक का हमला बरसात के दौरान केले में फूल आने की अवस्था में होता है। यह फूल के माध्यम से केले को संक्रमित करता है।
वहां से यह बाद में फल के सिरे तक फैल जाता है और एक सूखी सड़ांध का कारण बनता है जो राख के समान होता है जो सिगार, जैसा दिखाई देता है, जिसकी वजह से इस रोग का नाम सिगार ईण्ड रॉट पड़ा।
इस रोग का जैविक नियंत्रण
इस रोग के रोगकारक को नियंत्रित करने के लिए बेकिंग सोडा पर आधारित स्प्रे का इस्तेमाल किया जा सकता है। इस स्प्रे को बनाने के लिए प्रति लीटर पानी में 25 मिलीलीटर तरल साबुन के साथ 50 ग्राम बेकिंग सोडा को पानी में घोलकर घोल तैयार करते है। संक्रमण से बचाव के लिए इस मिश्रण को संक्रमित शाखाओं और आस-पास की शाखाओं पर स्प्रे करें। यह उंगलियों की सतह के पीएच स्तर को बढ़ाता है और कवक के विकास को रोकता है। कॉपर कवकनाशी यथा कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का स्प्रे भी प्रभावी हो सकते हैं।
रासायनिक नियंत्रण
यदि उपलब्ध हो तो हमेशा जैविक उपचार के साथ निवारक उपायों के साथ एक एकीकृत दृष्टिकोण पर विचार करें। आमतौर पर यह रोग मामूली महत्व का होता है और इसे शायद ही कभी रासायनिक नियंत्रण की आवश्यकता होती है। लेकिन विगत दो साल से इस रोग की उग्रता में भारी वृद्धि देखा जा रहा है क्योंकि अत्यधिक बरसात की वजह से वातावरण में भारी नमी है जो इस रोग के फैलाव के लिए अहम है। प्रभावित गुच्छों को एक बार मैन्कोजेब, थिओफेनेट मिथाइल या मेटलैक्सिल @1ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव किया जा सकता है और बाद में प्लास्टिक के साथ कवर किया जा सकता है।
इस रोग के निवारक के उपाय
Smart farming and agriculture app for farmers is an innovative platform that connects farmers and rural communities across the country.
© All Copyright 2024 by Kisaan Helpline