प्याज एक महत्वपूर्ण सब्जी एवं मसाला फसल

Vikas Singh Sengar

12-02-2022 01:35 AM

डा.विकास सिंह सेंगर1, डा. सुशील कुमार1, अमित सिंह1 , गोविंद कुमार1, संजय दत्त गहतोड़ी1, आदित्य राज दत्ता2 एवं प्रिय रंजन 2
1. कृषि संकाय , असिस्टेंट प्रोफेसर, शिवालिक इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज 
2. तृतीय वर्ष बी. एस. सी., कृषि संकाय, शिवालिक इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज

खाने में तड़का हो या सलाद हो, प्याज खाने का स्वाद ही बदल देता है। प्याज के बिना खाने का स्वाद नही आता। प्याज को काटते समय आंखों में पानी जरूर आता है, लेकिन प्याज के खाने से अनगिनत फायदे होते हैं, जिसका कोई मुकाबला नहीं है। खासकर तो गर्मियों में प्याज खाने से लू नहीं लगती। यहीं नहीं प्याज डायबिटीज व कैंसर जैसी बीमारियों से बचाने में भी सक्षम है।
प्याज़ (Onion) ही तो है वो जो जिसने ज्यादातर लोगों की डेली डाइट में अपना हिस्सा बना रखा  है। यहां तक अगर  सब्ज़ी और सलाद में प्याज़ न हो, तो खाने का स्वाद (Taste) ही अधूरा अधूरा सा रहता है। यही तो बात है खाने में प्याज के स्वाद की, अगर प्याज के रस को सिर में लगाये तो ये  रूसी या डैंड्रफ नहीं होने देता और हमारे बालों की रक्षा करता है।
प्याज़ में एंटीइंफ्लेमेट्री, एंटीसेप्टिक, एंटीमाइक्रोबियल और एंटीबैक्टीरियल गुणों से भरपूर्ण होता है। साथ ही साथ विटामिन ए, सी, और ई, पोटेशियम, सोडियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस, फोलेट, फाइबर, कार्बोहाइड्रेट, सल्फर, क्वेरसेटिन, कैलोरी और प्रोटीन जैसे कई अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं, फाइबर की मात्रा भी प्याज में ठीक ही होती है जोकि पाचन तंत्र को सही बनाए रखने में हमारी मदद करता है और कब्ज़ व गैस जैसी दिक्कतें भी काफी हद तक दूर करता है। ये ऐमारलीडेसी” परिवार का सदस्य है। इसका वैज्ञानिक नाम एलियस सेपा है। पूरे संसार में इसकी मांग वर्ष भर बनी रहती है।
प्याज एक महत्वपूर्ण सब्जी एवं मसाला फसल है तथा इसमें प्रोटीन एवं कुछ विटामिन भी अल्प मात्रा में पाए जाते है प्याज में बहुत ही ज्यादा औषधीय गुण पाये जाते है। प्याज का उपयोग हम सूप, अचार एवं सलाद को बनाने में किया जाता है। हमारे देश में प्याज उत्पादक राज्यो में महाराष्ट्र, गुजरात, उ.प्र., उड़ीसा, कर्नाटक, तमिलनाडू, म.प्र., आन्ध्रप्रदेश एवं बिहार प्रमुख हैं ।भारत से प्याज का निर्यात मलेसिया, यू.ए.ई. कनाड़ा , जापान, लेबनान एवं कुबेत में निर्यात किया जाता है।

जलवायु:
प्याज ठण्डे मौसम की फसल हैं, लेकिन इसे खरीफ में भी उगाया जा सकता हैं। कंद निर्माण के पूर्व प्याज की फसल के लिए लगभग 20°C से 24°C तापक्रम उपयुक्त माना जाता है। जबकि शल्क कंदों में विकास के लिए 15 डिग्री से. ग्रे. से 25 डिग्री से. ग्रे. का तापक्रम अच्छा मना जाता है।

मृदा:
प्याज की खेती के लिए उचित जलनिकास एवं जीवांषयुक्त उपजाऊ दोमट तथा बलुई दोमट भूमि जिसका पी.एच. मान 6.5-7.5 के मध्य हो सर्वोत्तम होती है, प्याज को अधिक क्षारीय या दलदली मृदाओं में नही उगाना चाहिए।

उन्नत किस्में:
खरीफ प्याज की प्रमुख उन्नत किस्में निम्नलिखित हैं- 1. एग्री फाउण्ड डार्क रेड:, 2. एन-53 :, 3. भीमा सुपर।

भूमि की तैयारी:
प्रथम जुताई हमेशा मिट्टी पलट हल से करना चाहिए। इसके बाद 2 से 3 जुताई कल्टीवेटर या हैरा से कर सकते हैं, प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाना अवश्य होता है। जोकि नमी सुरक्षित रखने के साथ ही मिट्टी भुर-भुरी भी करता है। भूमि को सतह से 15 से.मी. उंचाई पर 1.2 मीटर चैड़ी पट्टी पर रोपाई की जाती है अतः खेत को रेज्ड-बेड सिस्टम से तैयार किया जाना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक:
प्याज की फसल को अधिक पोषक तत्वो की आवश्यकता होती है। गोबर की सड़ी खाद 20-25 टन/हेक्टेयर रोपाई से एक-दो माह पहले खेत में डालना चाहिए। नत्रजन 100 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर, फॉस्फोरस 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर तथा पोटाश 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर के हिसाब से डाली जाती हैं। इसके अतिरिक्त सल्फर 20 से 25 कि.ग्रा.एवं जिंक 5 कि.ग्रा. का प्रति हेक्टेयर के हिसाब से डालना चाहिए जिससे प्याज की गुणवत्ता में  सुधार होता है।

पौध तैयार करना:
पौध शाला के लिए चुने गई स्थान की, पहले जुताई की जाती है पश्चात् पर्याप्त मात्रा में गोबर की सड़ी हुई खाद या कम्पोस्ट डालना चाहिए। पौधशाला को हमेशा रेतीली दोमट भूमि पर तैयार करना चाहिए, पौध शैय्या लगभग 15 से 20 सेमी. जमीन से ऊँचाई पर बनाना चाहिए बुवाई के बाद शैय्या में बीजों को 2-3 सेमी. मोटी सतह जिसमें छनी हुई महीन मृदा एवं सड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद से ढंक देना चाहिए। बुवाई से पूर्व शैय्या को 250 गेज पालीथीन द्वारा सौर्यकरण उपचारित कर ले। बीजों को हमेशा पंक्तियों में बोना चाहिए। खरीफ मौसम की फसल के लिए 5-7 सेमी. लाइन से लाइन की दूरी रखते हैं। इसके पश्चात् क्यारियों पर कम्पोस्ट, सूखी घास की पलवार (मल्चिंग) बिछा देते हैं जिससे भूमि में नमी संरक्षण हो सकें। पौधशाला में अंकुरण हो जाने के बाद पलवार हटा देना चाहिए। इस बात का ध्यान रखा जाये कि पौधशाला की सिंचाई पहले फव्वारें से करना चाहिए। पौधों को अधिक वर्षा से बचाने के लिए पौधशाला या रोपणी को पॉलिटेनल में उगाना उपयुक्त होगा।

बीज की मात्रा:
खरीफ मौसम के लिए 18-20 किग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती हैं।

पौधशाला शैय्या पर बीज की बुवाई एवं रोपाई का समय:
खरीफ मौसम  के लिए बुवाई 5 से 20 जून तक कर देना चाहिए, जब पौध 40 से 45 दिन की हो जाऐ तो रोपाई कर देना उत्तम माना जाता हैं। पौध की रोपाई कूड़ शैय्या पद्धिति से करना चाहिए, इसमें 1.2 मीटर चौड़ी शैय्या एवं लगभग 30 से.मी. चौड़ी नाली तैयार की जाती हैं।

खरपतवार नियंत्रण :
कुल 3 से 4 निराई-गुडाई की आवश्यकता होती है। खरपतवार नष्ट करने के लिए रासायनिक पदार्थो का उपयोग किया जाना उचित होता है। पैन्डीमैथेलिन 2.5 से 3.5 लीटर/हेक्टेयर अथवा ऑक्सीफ्लोरोफेन 600-1000 मिली/हेक्टेयर खरपतवार नाशक पौध की रोपाई के 3 दिन पश्चात 750 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना बहुत प्रभावी और उपयुक्त रहेगा।

सिंचाई एवं जलनिकास:
रोपण के बाद सिंचाई करना आवश्यक है, सिंचाई में देरी से पौधे मरने की संभावना बढ़ जाती हैं। सिंचाईयाँ आवश्यकतानुसार करना चाहिए। शल्ककन्द निर्माण के समय पानी की बिल्कुल भी कमी नहीं होना चाहिए क्योंकि यह प्याज फसल की क्रान्तिक अवस्था होती हैं। इस अवस्था में पानी की कमी के कारण उपज में भारी कमी हो जाती हैं, जबकि अधिक मात्रा में पानी बैंगनी धब्बा (पर्पिल ब्लाच) रोग को आमंत्रित करता हैं। 10 से 12 दिन के अंतराल से हल्की सिंचाई करना चाहिए।

कंदों की खुदाई:
खरीफ प्याज की फसल लगभग 5 माह में नवम्बर-दिसम्बर माह में तैयार हो जाती है। जैसे ही प्याज की गाँठ अपना पूरा आकर ले लें और पत्तियां सूखने लगे तो शीर्ष को पैर से कुचल देना चाहिए। कंद ठोस हो जाते हैं और उनकी वृद्धि रूक जाती है। इसके बाद कंदों को खोदकर कतारों मे रखकर सुखाते है।

फसल सुरक्षा:-

  • थ्रिप्स: को रोकने के लिए नीम तेल आधारित कीटनाशियों का छिड़काव करें या इमीडाक्लोप्रिड कीटनाशी 17.8 एस.एल. दवा की मात्रा 125 मिली./हे. 500-600 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
  • माइट:  नियंत्रण हेतु 0.05ः डाइमेथोएट दवा का छिड़काव करें।    
  • बैंगनी धब्बा (परपल ब्लॉच): मेनकोजेब (2.5 ग्रा./ली. पानी)।

उपज : 280-320 क्विंटल / हैक्टेयर ।

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