मसाला एवं सुगंध पौधों की नर्सरी को एक उद्यम के रूप में अपनाने से औद्योगिक विकास एवं स्वरोजगार की प्रबल सम्भावनाएँ

Vikas Singh Sengar

08-11-2021 02:54 AM

1.गिरजेश कन्नौजिया  2. के. के. सिंह, 3.विकास सिंह सेंगर एवं  4. सुशील कुमार,


1. कृषि प्रसार विभाग, आचार्य नरेंद्र देव कृषि एंव प्रौद्योगिकीय विश्वविद्यालय कुमारगंज, अयोध्या
2. कृषि अर्थशास्त्र विभाग आचार्य नरेंद्र देव कृषि एंव प्रौद्योगिकीय विश्वविद्यालय कुमारगंज, अयोध्या
3. & 4. असिस्टेंट प्रोफेसर, शिवालिक इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज

    
व्यावसायिक खेती के अवसर एवं लाभ
सुन्दर फूलों के लिए इनके पौधों को उगाना फूलों की खेती अथवा पुष्पोत्पादन कहलाता है। सामाजिक और धार्मिक मूल्यों के प्रति मानवीय अभिरुचि में परिवर्तन के कारण दिन-ब-दिन फूलों की मांग बढ़ रही है। फूलों का अब भारत में लगभग सभी समारोहों में इस्तेमाल होने लगा है, जिसकी वजह से इनकी घरेलू मांग में वृदि हो रही है। कट-फ्रलावर कीअंतर्राष्ट्रीय मांग, विशेष तौर पर क्रिसमस और वेलेंटाइन डे के दौरान बहुत अधिक बढ़ जाती है। गुलाब, गेरबेरा, कार्नेशन, क्रिजेन्थेयॅम, आर्किड्स ग्लैडियोलस तथा कुमुदिनी आदि की  अधिक मांग है। फूल उद्योग में वार्षिक वृदि क्षमता करीब 25 – 30 % है। इस तीव्र वृदि का आधार इसकी निर्यात क्षमता है। इसका बाजार बहुत व्यापक है तथा भारतीय कट-फ्रलावर के निर्यात की क्षमता की कोई सीमा नहीं है। एक सामान्य उष्णकटिबंधी देश होने के कारण, भारत सजावटी पौधें का खजाना है। भोजन को सुवास बनाने, रंगने या संरक्षित करने के उद्देश्य से उसमें मिलाए जाने वाले सूखे बीज, फल, जड़, छाल, या सब्जियों को मसाला कहते हैं। इनका उपयोग फ्लेवर देने या अलंकृत करने के लिए किया जाता है। बहुत से मसालों में सूक्ष्मजीवाणुओं को नष्ट करने की क्षमता पाई जाती है।

स्वरोजगार के अवसर
इस क्षेत्र में स्वरोजगार की अच्छी संभावनाएं हैं। सीमित संसाधनों के साथ लघु फूल उत्पादन उद्योग स्थापित किए जा सकते हैं जो कि एक लाभकारी रोजगार हो सकता है। इस उद्योग में बहुत अच्छी रोजगारपरक और विदेशी मुद्रा अर्जित करने की क्षमता है।फलफूल रहा है नर्सरी का व्यवसाय - फूल पौधे हैं स्वास्थ्य के लिए लाभदायक, आदमनी बढ़ाने में भी है कारगर है। नर्सरी का व्यवसाय तेजी से फल फूल रहा है। युवाओं को नर्सरी का व्यवसाय खूब भा रहा है। यही कारण है कि बड़े पैमाने पर युवा नर्सरी प्रबंधन को रोजगार के नए अवसर के रूप में अपना  सकते हैं। कम पूंजी निवेश होने के कारण नर्सरी का व्यवसाय युवाओं को आकर्षित कर रहा है। नर्सरी प्रबंधन एक ऐसी व्यवस्था है, जो पर्यावरण के प्रति लोगों की मानसिकता भी बदल रही है शुरुआती दौर में हम लोगों ने एक छोटे से जमीन में नर्सरी लगाकर पौधे को बाजार में ले जाकर बेचना शुरू कर के किसान  आमदनी बढ़ा सकते हैं । कुल मिलाकर नर्सरी प्रबंधन रोजगार के अवसर बढ़  सकते हैं। इसमें लीली, पेंसी, डाहलिया, गेंदा फूल, गुलाब, गुलदाउदी, बेली, चमेली, हरसंगार ,नाइट जैस्मीन, जूही, रात रानी, मोगरा, जूही, तुलसी का पौधा दुर्लभ पौधे इनडोर आउटडोर शो प्लांट को लेकर लगाते हैं। 

फूल पौधे स्वास्थ्य के लिए हैं लाभदायक :
वृक्ष, पौधों और फूलों में शारीरिक और मानसिक रोगों को दूर करने की क्षमता के अलावा वास्तुदोष मिटाने की क्षमता भी होती है। फूलों के बारे में कहा जाता है कि वे आपका भाग्य बदलकर आपके जीवन में खुशियां भरते हैं। फूल रात में ही खिलते हैं, यह जीवन से तनाव खत्म करता है।चंपा से वातावरण शुद्ध रहता है। चमेली की खुश्बू से दिमाग की गर्मी दूर होती है। रात रानी से जीवन के संताप मिटता है। मोगरा मुंह और नेत्र रोग में लाभदायक है। गुलाब, बेला, जूही, चंपा, चमेली, मौलसरी से रक्त विकार दूर होते हैं और मन प्रसन्न रहता है। घर की हवा को शुद्ध रखने के लिए इंडोर पौधे भी लगाना चाहिए। घर में लगे पौधे न केवल घर का वातावरण अच्छा बनाए रखते है बल्कि घर को खूबसूरत लुक भी देते हैं। कुछ पौधे ऐसे भी है, जो रात को ऑक्ससीजन छोड़ते है। ऑक्सीजन हमारी सेहत के साथ-साथ घर का वातावरण भी शुद्ध रखता है। एलोवेरा त्वचा और स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होता है। इसके अलावा यह घर में लगा एलोवेरा पौधा वातावरण भी शुद्ध रखता है। यह रात के समय ऑक्सीजन छोड़ता है। इसी प्रकार तुलसी, नीम, एलोविरा ऑर्चिट्स, ऑरेंज गेरबरा, एरिका पाम जैसे पौधे घर से विषेली गैसों को निकाल कर हवा को शुद्ध रखता है।

भारत एवं पूरे विश्व में औषधीय एवं सुगंधित पौधों की मांग निरंतर बढ़ रही है और इस विषय पर कार्य कर रहे दुनिया भर के वैज्ञानिकों का मत है कि इस मांग में निरंतर बढ़ोत्तरी की सम्भावनाएँ हैं। भारत में लगभग 8 हजार करोड़ रुपयों की औषधीय पौधें से बनी दवाओं का बाजार है। अभी लगभग 80 प्रतिशत औषधीय पौधे प्राकृतिक स्त्रोतों से प्राप्त किये जाते हैं। परन्तु जंगलों के कट जाने और बढ़ती हुई मांग के कारण प्राकृतिक स्त्रोतों से औषधीय पौधों की मांग को पूरा करना कठिन होता जा रहा है। अनेक औषधीय पौधे तो दुर्लभ हो गये हैं और अनेक पौधों की प्रजातियाँ विलुप्त हो गई हैं। इन कठिनाईयों के कारण औषधीय पौधों की खेती करना आवश्यक हो गया है औषधीय एवं सुगंध पौधों की खेती से कार्य-बल का कुशल उपयोग किया जा सकता है। पारंपरिक फसलों की तुलना में औषधीय एवं सुगंध फसलों में कीटों और रोगों का प्रकोप कम देखने को मिलता है। इन फसलों की खेती कम उपजाऊ और समस्याग्रस्त मृदाओं में भी की जा सकती है। ये फसलें और प्रौद्योगिकियाँ किसान-अनुकूल और पर्यावरण-अनुकूल हैं औषधीय एवं सुगंध पौधों की खेती कर किसान आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो सकते हैं  भारत में औषधीय एवं सुगंध पौधों की खेती करने के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं। औषधीय पौधों का उपयोग आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 80 प्रतिशत जनसंख्या परंपरागत औषधियों से जुड़ी हुई है। वर्तमान समय में औषधीय एवं सुगंध पौधों की खेती करने की संभावनाएँ अधिक हैं  भारत की जलवायु में इन पौधों का उत्पादन आसानी से लिया जा सकता है। सुगंध पौधों से प्राप्त होने वाले इसेंशियल ऑइल की देशी बाज़ार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी माँग बढ़ रही है। वहीं भारतीय औषधीय पौधों की भी विश्व बाज़ार में बहुत माँग है। 

सुगंध पौधों का महत्व:
सुगंध पौधों से प्राप्त होने वाले इसेंशियल ऑइल का उपयोग आधुनिक सुगंध एवं सौंदर्य प्रसाधन उद्योग में व्यापक रूप में हो रहा है। सुगंध पौधों का तेल मुख्यत: इत्र, साबुन, धुलाई का साबुन, घरेलू शोधित्र, तकनीकी उत्पादों तथा कीटनाशक के रूप में होता है। साथ ही सुगंध तेल का उपयोग चबाने वाले तंबाकू, मादक द्रवों, पेय पदार्थों, सिगरेट तथा अन्य विभिन्न खाद्य उत्पादों के बनाने में भी किया जाता है। सुगंध पौधे, जैसे कि पुदीना के तेल का उपयोग च्यूइंगम, दंतमंजन, कन्फेक्शनरी और भोजन पदार्थों में होता है। खस जैसी सुगंध फसल से सुगन्धित द्रव तथा सुगन्ध स्थिरक व फिक्सेटीव के रूप में प्रयोग होता है।

औषधीय एवं सुगंध पौधों की व्यावसायिक खेती के अवसर एवं लाभ
भारत में इन पौधों की खेती के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं। औषधीय एवं सुगंध पौधों की खेती से टिकाऊ आधार पर लाभप्रद रिटर्न प्राप्त किया जा सकता है। भारत में उत्पादन होने वाला सुगंध पौधों का तेल फ्रांस, इटली, जर्मनी व संयुक्त राज्य अमेरिका को निर्यात किया जाता है। आज देश के हज़ारों किसान औषधीय एवं सुगंध पौधों की खेती करके अधिक मुनाफा कमा सकते हैं, जिससे उनकी आय में वृद्धि होगी। 
औषधीय एवं सुगंध पौधों की खेती की लागत को कम करने के लिए एवं मुनाफे को बढ़ाने के लिए बाय-प्रॉडक्ट्स को प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सकता है। औषधीय एवं सुगंध पौधों की खेती से कार्य-बल का कुशल उपयोग किया जा सकता है। इन पौधों की खेती से निर्यात के माध्यम से विदेशी मुद्रा को अर्जित किया जा सकता है। एकीकृत कृषि प्रणालियों को अपनाकर पारंपरिक कृषि/बागवानी फसलों की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक शुद्ध लाभ कमाया जा सकता है। अन्य पारंपरिक फसलों की तुलना में औषधीय एवं सुगंध फसलों में कीटों और रोगों का प्रकोप कम देखने को मिलता है। इन फसलों की खेती कम उपजाऊ और समस्याग्रस्त मृदाओं में भी की जा सकती है। ये फसलें और प्रौद्योगिकियाँ किसान-अनुकूल और पर्यावरण-अनुकूल हैं। औषधीय एवं सुगंध फसलों पर घरेलू जानवरों और पक्षियों द्वारा कम से कम नुकसान पहुँचता है। औषधीय एवं सुगंध पौधों से प्राप्त होने वाले उत्पादों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

औषधीय एवं सुगंध पौधों की व्यावसायिक खेती
सेन्ना, अश्वगंधा, तुलसी, कालमेघ, पिप्पली, आंवला, सफेद मूसली, घृतकुमारी, आर्टीमीसिया, स्टीविया, जावा घास या सिट्रोनेला, लेमन ग्रास, रोशा घास या पामारोजा, खस या वेटीवर, नींबू-सुगंधित गम, जेरेनियम, मेन्थॉल मिंट, पुदीना, जंगली गेंदा, रोजमेरी, पचौली और पत्थरचूर आदि आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण औषधीय एवं सुगंध फसलें हैं । 

मसाला:

  • भोजन को सुवास बनाने, रंगने या संरक्षित करने के उद्देश्य से उसमें मिलाए जाने वाले सूखे बीज, फल, जड़, छाल, या सब्जियों को ' मसाला कहते हैं। इनका उपयोग फ्लेवर देने या अलंकृत करने के लिए किया जाता है। बहुत से मसालों में सूक्ष्मजीवाणुओं को नष्ट करने की क्षमता पाई जाती है।
  • भोजन को सुवास बनाने, रंगने या संरक्षित करने के उद्देश्य से उसमें मिलाए जाने वाले सूखे बीज, फल, जड़, छाल, या सब्जियों को ' मसाला  कहते है।
  • भोजन को सुवास बनाने, रंगने या संरक्षित करने के उद्देश्य से उसमें मिलाए जाने वाले सूखे बीज, फल, जड़, छाल, या सब्जियों को ' मसाला कहते हैं। कभी-कभी मसाले का प्रयोग दूसरे फ्लेवर को छुपाने के लिए भी किया जाता है।

भारतीय मसालों की सूची
भारतीय मसाले देश और दुनिया सभी जगह अपनी खुशबू और रंग के लिए मशहूर हैं। भारतीय किचन की इन बेसिक जरूरत पर आप भी जीरा, इलायची , बड़ी इलायची, दालचीनी, हल्दी, मिर्च, धनिया जैसी मसाला व्यापार कर अपना कारोबार खड़ा खड़ा कर सकते हैं।


साधारण भाषा में मसाला उन कृषि उत्पादों को कहते हैं जो स्वयं खाद्य पदार्थ तो नहीं होते हैं परन्तु उनका उपयोग खाद्य सामग्री को सुगन्धित, स्वादिष्ट, रुचिकर, सुपाच्य व मनमोहक बनाने के लिए किया जाता है । अंग्रेजी में मसालों को ‘स्पाइसेज एण्ड कॉन्डिमेन्टस’ कहा जाता है । स्पाइसेज के अन्तर्गत वे मसालें सम्मिलित किए जाते हैं जिन्हें खाद्य पदार्थों के निर्माण में साबुत पीसकर या घोलकर मिलाते हैं जबकि जिन मसालों का उपयोग खाद्य सामग्री में तड़का या बघार के रूप में करते हैं वह ”कॉन्डिमेन्टस” कहलाते हैं । भारत को मसालों का देश कहा जाता है, क्योंकि भारत में विश्व के सर्वाधिक प्रकार के सर्वाधिक मात्रा में मसाले उत्पादित किए जाते हैं । भारत विश्व में मसालों का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक देश है। विश्व में मसालों का महत्व समझे जाने के कारण इनका उपयोग प्रतिवर्ष लगातार बढ़ रहा है । मसालों का महत्व न केवल इनका स्वादिष्ट व सुगन्धकारक होने के कारण है अपितु इनका आर्थिक, व्यावसायिक एवं औद्योगिक व औषधीय महत्व भी बहुत अधिक है ।

  1. मसालों की खेती नगदी फसलें होने के कारण कृषक को अधिक आमदनी प्राप्त करने का स्रोत है । 
  2. शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में कृषक की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने में इनका प्रमुख योगदान रहता है । इन क्षेत्रों में परम्परागत फसलों के साथ कृषक अच्छी आमदनी के लिए मसालों की खेती भी करते हैं ।
  3. मसालों की फसलों का स्वरूप व्यावसायिक है अतः इसकी निरन्तर देखरेख व सुरक्षा की नियमित व्यवस्था रखनी होती है जिससे कृषक परिवार व अन्य श्रमिकों को अधिक रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं |
  4. मसालों का औद्योगिक महत्व भोज्य पदार्थों एवं पेय पदार्थों के निर्माण सम्बन्धी कई उद्योगों से है । अचार, डिब्बाबंद भोज्य पदार्थ, मेन्थोल, ओलियोरेजिन्स, वाष्पशील तेल, क्रीम, सुगन्धित द्रव्य एवं शृंगार प्रसाधन, सुगन्धित साबुन व दन्त क्रीम आदि के निर्माण में इनका उपयोग होता है ।
  5. भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान होने के कारण भारत जैसे विकासशील देशों में मसालों का निर्यात विदेशी मुद्रा अर्जन का महत्वपूर्ण स्रोत है । मसालों के निर्यात से न केवल विदेशी मुद्रा अर्जित होती है, अपितु मसालों के उत्पादन, संसाधन व निर्यात में लगे व्यक्तियों को भी पर्याप्त लाभ प्राप्त होता है ।
  6. प्राचीन काल से ही मसालों का उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार व शारीरिक स्वास्थ्य बनाए रखने हेतु किया जाता रहा है । प्रसूति महिलाओं में वात व गर्भाशय रोग, दन्त चिकित्सा, जठर रोगों के निवारण में इनका उपयोग किया जाता है ।
  7. मसालों का स्वरूप बदलकर विभिन्न रूपों में परिवर्तन किए जाने से विश्व बाजार में इनका महत्व बढा है । इनसे निकाले जाने वाले वाष्पशील तेल तथा ऑलियोरोजिन्स का भण्डारण, विपणन व निर्यात करना सुविधाजनक रहता है, क्योंकि मसालों की मूल आयतन की तुलना में इनके कृत्रिम स्वरूप का आयतन बहुत ही कम होता है।


मसालों की उपयोगिता:
 उद्यानिकी फसलों में मसालों का महत्त्वपूर्ण स्थान है जिनका उपयोग उनके वनस्पति उत्पाद या उनके भाग जो बाहर से मुक्त हो, भोज्य पदार्थों को जायकेदार, स्वादिष्ट एवं खुशबूदार बनाने में किया जाता है । मसाला शब्द का उपयोग पूर्ण उत्पाद या पिसे हुए उत्पाद दोनों के लिए किया जाता है ।
मसालों की उपयोगिता 
1. भोज्य पदार्थों के रूप में उपयोगिता:
2. खाद्य-सुरक्षा व उपयोगिता:
3. भोज्य पदार्थों को प्राकृतिक रंग प्रदान करने में:
4. औद्योगिक उपयोग:


मसालों का उपयोग विभिन्न स्वरूपों में किया जाता है, जिसमें पाउडर (पिसा मसाला), वाष्पशील तेल, औलियोरेजिन्स मसालों का सत्व औषधि निर्माण में, इत्र, सौन्दर्य-प्रसाधन, क्रीम, लोशन, साबुन, दन्तमंजन एवं अन्य उद्योगों में भी किया जाता है । इनमें पाए जाने वाले प्रति- ऑक्सीकारक, प्रतिरक्षक, प्रति-सूक्ष्मजैविक, प्रति जैविक एवं औषधीय जैसे गुण इनके औद्योगिक उपयोग को आधार प्रदान करते हैं ।
इनकी दैनिक एवं नियमित माँग अधिक होने के कारण ,इनकी खेती से लागत की तुलना में आमदनी अधिक होती है, खेती से प्राप्त होने वाले उत्पादों की तुड़ाई, कटाई, छंटाई श्रेणीकरण, पैकिंग से लेकर विपणन तक के कार्यों में मानव श्रम की आवश्यकता होती है। इस क्षेत्र से ग्रामीणों को रोजगार मिलने की अधिक सम्भावना है। रोजगार मिलने के साथ छंटाई, श्रेणीकरण पैकिंग आदि से उत्पादों की गुणवत्ता को बढ़ाकर अधिकतम लाभ भी कमाया जा सकता है। किसानों की आय में कृंतिकारी परिवर्तन करने के लिए यह उद्यम बहुत उपयोगी है।

बीज उत्पादन एवं नर्सरी : 
फल, फूलों और सब्जियों के बीज प्रायः अत्यन्त छोटे होते हैं जो बिना उपचार के नहीं उगते हैं कुछ का तो सिर्फ वानस्पतिक वर्धन ही किया जा सकता है।बाग-बगीचों और पुष्प वाटिकाओं में फल, फूलों एवं शोभाकारी पेड़-पौधों के साथ बागवानी की अन्य फसलों के लिये सामान्यतः बीजों की सीधी बुवाई न करके नर्सरी में पहले पौध तैयार करते हैं। इसके बाद खेत में रोपण करते हैं।जिन ग्रामीण बेरोजगारों के पास जमीन और पूँजी की कमी है, वे इस उद्यम को अपनाकर अच्छा लाभ कमाने के साथ अन्य लोगों को भी रोजगार उपलब्ध करवा सकते हैं। नर्सरी पौध तैयारी करने के लिये तकनीकों का प्रयोग करना पड़ता है। पौधे पर्यावरण को संतुलित तो करते ही हैं लेकिन ये हरे-भरे पौधे बेरोजगार हाथों को काम भी दे सकते हैं। पौधों की बिक्री के लिए खुली नर्सरी में बड़े पैमाने पर बेरोजगारों को काम मिल सकता है अतः व्यक्ति का दक्ष एवं प्रशिक्षित होना जरूरी है।पढ़े-लिखे युवा सुगंध पौधों की नर्सरी को एक उद्यम के रूप में अपनाकर अपनी आमदनी भी बढ़ा सकते हैं। 

औषधीय एवं सुगन्धीय पौधों की खेती : 
भारत में आजकल दवाइयों के लिये औषधीय पौधों और फल-फूल इत्यादि की खेती कारोबार के लिये की जा रही है। लहसुन, प्याज, अदरक, करेला, पुदीना और चौलाई जैसी सब्जियाँ पौष्टिक होने के साथ औषधीय गुणों से भी भरपूर हैं। इनसे कई तरह की आयुर्वेदिक औषधि व खाद्य पदार्थ बनाकर किसान  आमदनी बढ़ा सकते हैं। 
उपरोक्त जानकारी के आधार पर कोई भी किसान यह निर्णय कर सकता है कि कृषि व इससे सम्बन्धित उद्यम में से अपनी परिस्थिति के अनुसार वह कौन से उद्यम को अपनाकर अपनी जीविका चलाने के साथ-साथ लाभ भी कमा सकता है। इसके अलावा सरकार द्वारा कौन-कौन सी सुविधाएँ व अनुदान उपलब्ध कराये जा रहे हैं, आदि जानकारियों का लाभ उठाकर किसानभाई स्वरोजगार की तरफ उन्मुख हो सकते हैं। उपरोक्त उद्यमों का सही मात्रा में समावेश करके किसान अपनी आय दूना करने से भी अधिक आय अर्जित कर सकते हैं। इन विधाओं का प्रयोग करके किसान भाई माननीय प्रधानमंत्री जी की आकांक्षा और उपेक्षा को निर्धारित समय से पहले ही पूर्ण करके अपने जीवन स्तर में चहुंमुखी विकास कर सकते है। साथ ही साथ देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दे सकते हैं।

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