Vikas Singh Sengar
13-12-2022 01:19 AMविकास सिंह सेंगर1, निशा2, रोहित शाक्य3 व के के सिंह4
1. असिस्टेंट प्रोफेसर शिवालिक इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज
2. कीट विज्ञान , श्री राम जानकी महाविधालय , रामनगर , अमौसूफी, अयोध्या,
3. असिस्टेंट प्रोफेसर, शिवालिक कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग
4. असिस्टेंट प्रोफेसर, आचार्य नरेंद्र देव यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी कुमारगंज अयोध्या
करेले में प्रचूर मात्रा में विटामिन A, B और C पाए जाते हैं। इसके अलावा कैरोटीन, बीटाकैरोटीन, लूटीन, आइरन, जिंक, पोटैशियम, मैग्नीशियम और मैगनीज जैसे फ्लावोन्वाइड पाए ।
करेले की शंकर बीज की बुवाई करने के लिए बलुई दोमट या दोमट मिट्टी होनी चाहिए। खेत समतल तथा उसमें जल निकास व्यवस्था के साथ सिंचाई की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। करेले को गर्मी और वर्षा दोनो मौसम में उगाया जा सकता है।
करेले की बुवाई करने से 25-30 दिन पहले 25-30 टन गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिलाना चाहिए। बुवाई से पहले नालियों में 50 किलो डीएपी, 50 किलो म्यूरेट आफ पोटास का मिश्रण प्रति हैक्टेयर के हिसाब से मिलाऐं। 30 किलो यूरिया बुवाई के 20-25 दिन बाद व 30 किलो यूरिया 50-55 दिन बाद पुष्पन व फलन के समय डालना चाहिए। यूरिया सांय काल मे जब खेत मे अच्छी नमी हो तब ही डालना चाहिए।
बीज की मात्रा व बुआई
करेले का 500 से 600 ग्राम बीज प्रति एकड़ पर्याप्त होता है। पौध तैयार करके बीज फसल लगाने पर बीज मात्रा मे कमी की जा सकती है। बुवाई से पहले बीजों को बाविस्टीन (2 ग्रा प्रति किलो बीज दर से) के घोल में 18-24 घंटे तक भिगोये तथा बुवाई के पहले निकालकर छाया में सुखा लेना चाहिए। बीज 2 से 3 इंच की गहराई पर करना चाहिए।
फसल अंतरण
नाली से नाली की दूरी 2 मी., पौधे से पौधे की दूरी 50 सेंमी तथा नाली की मेढों की ऊंचाई 50 सेंमी रखनी चाहिए। नालीयां समतल खेत में दोनो तरफ मिट्टी चढ़ाकर बनाऐं। खेत मे 1/5 भाग मे नर पैतृक तथा 4/5 भाग में मादा पैतृक की बुआई अलग अलग खण्डो में करनी चाहिए।
फसल के लिए मजबूत मचान बनाएं और पौधों को उस पर चढांए जिससे फल खराब नहीं होते हैं और तोड़ाई करने में भी आसानी होती है।
फल तुड़ाई व बीज निकालना
फल पकने पर फल चमकीले नारंगी रंग के हो जाते हैं। फल को तभी तोड़ना चाहिए जब फल का कम से कम दो तिहाई भाग नारंगी रंग का हो जाये क्योकि कम पके फल में बीज अल्प विकसीत रहते हैं। अधिक पकने पर फल फट जाते हैं और बीज का नुकसान होता है।
उन्नत किस्में
ग्रीन लांग, फैजाबाद स्माल, जोनपुरी, झलारी, सुपर कटाई, सफ़ेद लांग, ऑल सीजन, हिरकारी, भाग्य सुरूचि , मेघा – एफ 1, वरून – 1 पूनम, तीजारावी, अमन नं.- 24, नन्हा क्र. – 13, कल्याणपुर बारहमासी, पूसा विशेष, हिसार सलेक्शन, कोयम्बटूर लौंग, अर्का हरित, प्रिया को-1, एस डी यू- 1, कल्याणपुर सोना, पूसा शंकर-1, पूसा हाइब्रिड-2, पूसा औषधि, पूसा दो मौसमी, पंजाब करेला-1, पंजाब-14,, सोलन हरा और सोलन सफ़ेद
जलवायु
करेले कि बढ़वार के लिए न्यूनतम तापक्रम 20 डिग्री सेंटीग्रेड तथा अधिकतम 35 - 40 डिग्री सेंटीग्रेड होना चाहिए।
बीज की मात्रा व नर्सरी
खेत में बनाये हुए हर थाल में चारों तरफ 4 – 5 बीज 2 – 3 से. मी. गहराई पर बो देना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु की फसल हेतु बीज को बोआई से पूर्व 12 – 18 घंटे तक पानी में रखते हैं। पौलिथिन बैग में एक बीज/प्रति बैग ही बोते है। बीज का अंकुरण न होने पर उसी बैग में दूसरा बीज पुन बोआई कर देना चाहिए। इन फसलों में कतार से कतार की दूरी 1.5 मीटर एवं पौधे से पौधे की दूरी 60 से 120 से. मी. रखना चाहिए।
क्षेत्र की तैयारी
खेत में करेले की फसल लगाने के लिए सर्वप्रथम पौधों की कतार से कतार एवं पौधे की दूरी का ज्ञान होना आवश्यक है, जो कि तालिका में दिया हुआ है। कतार एवं पौधों के बीज की दूरी के हिसाब से उचित दूरी पर गोबर खाद 10 – 12 किलोग्राम डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिलाकर थाला बनाना चाहिए। हर एक थाले में बोवाई से पूर्व 2-3 ग्राम फ्यूराडॉन या फोरेट दानेदार दवा बिखेर कर अच्छी तरह से मिला देना चाहिए।
रोपाई की विधि
बीजों को नालियों के दोनों तरफ बुआई करते हैं। नालियों की सिंचाई करके मेड़ों पर पानी की सतह के ऊपर 2-3 बीज एक स्थान पर इस प्रकार लगाये जाते हैं कि बीजों को नमी कैपिलटी मुखमेंट से प्राप्त हो। अंकुर निकल आने पर आवश्यकतानुसार छंटाई कर दी जाती है। बीज बोने से 24 घंटे पहले पानी में भिगोकर रखें, जिससे अंकुरण में सुविधा होती है।
खाद एवं उर्वरक
उर्वरक देते समय ध्यान रखें की नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा स्फूर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोवाई के समय देना चाहिए। शेष नाइट्रोजन की आधी मात्रा टाप ड्रेसिंग के रूप में बोवाई के 30-40 दिन बाद देना चाहिए। फूल आने के समय इथरेल 250 पी. पी. एम. सांद्रता का उपयोग करने से मादा फूलों की संख्या अपेक्षाकृत बढ़ जाती है, और परिणामस्वरूप उपज में भी वृद्धि होती है। 250 पी. पी. एम. का घोल बनाने हेतु (0.5 मी. ली.) इथरेल प्रति लिटर पानी में घोलना चाहिए करेले की फसलों को सहारा देना अत्यंत आवश्यक है।
सिंचाई
फसल की सिंचाई वर्ष आधारित है। साधारणत: प्रति 8-10 दिनों बाद सिंचाई की जाती है।
फल तुड़ाई
फलों को साधारणत: उस समय तोड़ा जाता है, जब बीज कच्चे हों। यह अवस्था फल के आकार एवं रंग से मालूम की जा सकती है। जब बीज पकने की अवस्था आती हैं, तो फल पीले – पीले होकर रंग बदल लेते हैं।
करेला की प्रति एकड़ लागत 20-25 हज़ार रुपये होती है। इससे 50-60 क्विंटल तक उपज मिल जाती है। इसका बाज़ार में करीब 2 से 2.5 लाख रुपये का भाव मिल जाता है। इस तरह करेला की खेती से किसानों को अच्छा फ़ायदा मिलता है।
Smart farming and agriculture app for farmers is an innovative platform that connects farmers and rural communities across the country.
© All Copyright 2024 by Kisaan Helpline